कोलकाता :- सुप्रीम कोर्ट ने कोयला तस्करी मामले में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की कार्यप्रणाली पर कड़ा असंतोष व्यक्त किया है। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति संदीप मेहता और न्यायमूर्ति विजय बिश्नोई की पीठ ने मंगलवार को मामले की सुनवाई के दौरान केंद्रीय जांच एजेंसी ED की मंशा और जांच की गति पर गंभीर सवाल उठाए। अदालत ने इस बात पर हैरानी जताई कि आखिर यह मामला पिछले 6 साल से क्यों खिंच रहा है और ईडी ने अब तक मुख्य आरोपियों के खिलाफ कोई निर्णायक कदम क्यों नहीं उठाया।

यह मामला तब सामने आया जब ईडी ने मुख्य आरोपी अनूप मांझी की जमानत का विरोध करते हुए शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटाया। ईडी के वकील ने तर्क दिया कि अनूप मांझी लंबे समय तक फरार था और बाद में निचली अदालत में आत्मसमर्पण कर जमानत हासिल कर ली। ED ने इसे देश की संपत्ति की लूट और एक बड़े वित्तीय घोटाले का हिस्सा बताया, जिसमें कई प्रभावशाली लोग शामिल हैं। हालांकि, कोर्ट ने ईडी की इन दलीलों को आड़े हाथों लेते हुए पूछा कि जब एजेंसी के पास पर्याप्त समय था, तो उसने आरोपियों को हिरासत में लेकर कड़ी कार्रवाई क्यों नहीं की।

सुप्रीम कोर्ट ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि ईडी की जांच का तरीका काफी बिखरा हुआ और ढीला नजर आता है, जिससे ऐसा प्रतीत होता है कि एजेंसी ने इस संवेदनशील मामले को गंभीरता से नहीं लिया। कोर्ट ने यह भी सवाल किया कि इतने सालों तक निष्क्रिय रहने के बाद अब अचानक जमानत का विरोध क्यों किया जा रहा है। पीठ ने नाराजगी जाहिर करते हुए अब ईडी से पूरे मामले पर विस्तृत हलफनामा पेश करने को कहा है।

गौरतलब है कि कोयला तस्करी के इस बड़े मामले में अनूप मांझी उर्फ लाला के साथ-साथ कई नेताओं के नाम भी जुड़े होने का दावा ईडी ने किया है। पिछले साल नवंबर में पश्चिम बंगाल और झारखंड के 40 से अधिक ठिकानों पर छापेमारी के दौरान करोड़ों की नकदी और सोना बरामद किया गया था। ED का आरोप है कि लाला के नेतृत्व में एक सिंडिकेट अवैध खनन और कोयले की तस्करी कर रहा था, जिसमें काले धन को सफेद करने के लिए कई फर्जी कंपनियों का सहारा लिया गया। अब सुप्रीम कोर्ट के कड़े रुख के बाद ईडी को अपनी जांच की प्रगति का ठोस हिसाब देना होगा।