नई दिल्ली/कोलकाता :- पश्चिम बंगाल के सरकारी कर्मचारियों के लिए महंगाई भत्ते (DA) को लेकर चल रही कानूनी लड़ाई में सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने राज्य सरकार को स्पष्ट निर्देश दिया है कि साल 2019 तक का जो भी पुराना डीए बकाया है, उसका 25 प्रतिशत हिस्सा कर्मचारियों को अनिवार्य रूप से भुगतान करना होगा। इसके लिए अदालत ने एक समय सीमा भी निर्धारित कर दी है।
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस संजय करोल और जस्टिस मनोज मिश्रा की पीठ ने अपने पुराने रुख को बरकरार रखते हुए कहा कि डीए सरकारी कर्मचारियों का कानूनी अधिकार है। गौरतलब है कि राज्य सरकार ने बकाया भुगतान के लिए और समय मांगने के उद्देश्य से सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था, लेकिन अदालत ने साफ कर दिया कि अगस्त 2008 से दिसंबर 2019 के बीच के कुल बकाया का 25 फीसदी हिस्सा तुरंत चुकाना होगा।
शेष 75 प्रतिशत बकाया राशि के भुगतान की रूपरेखा तय करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने एक नई उच्च स्तरीय समिति के गठन का आदेश दिया है। एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश के नेतृत्व में बनने वाली इस चार सदस्यीय समिति का काम यह तय करना होगा कि बाकी की राशि का भुगतान कितनी किस्तों में और किस प्रकार किया जाए। समिति राज्य की आर्थिक स्थिति और कर्मचारियों के हितों के बीच संतुलन बनाकर अपनी रिपोर्ट देगी।
अदालत की कार्यवाही के दौरान राज्य सरकार की ओर से दलील दी गई थी कि एक साथ बड़ी राशि का भुगतान करने से राज्य की आर्थिक व्यवस्था चरमरा सकती है। हालांकि, याचिकाकर्ताओं के वकीलों ने कर्मचारियों के हक की बात पुरजोर तरीके से रखी। यह स्पष्ट किया गया है कि गुरुवार का फैसला केवल 2019 तक के पुराने बकाया से संबंधित है और इसका केंद्र सरकार के साथ वर्तमान में चल रहे 40 प्रतिशत डीए के अंतर (DA Gap) से कोई सीधा संबंध नहीं है।

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