कोलकाता: जीरों से ज्यादा खाने का न तो कांग्रेस के पास है और न ही वामफ्रंट के पास। विधानसभा में कांग्रेस भी शुन्य है और वामफ्रंट भी शुन्य है। 2016 में पहली बार वामफ्रंट के साथ गठबंधन कर कांग्रेस प्रधान विरोधी दल के रूप में अपने आप को स्थापित किया था किन्तु पुनः 2021 के विधानसभा चुनाव में न कांग्रेस को एक सीटे मिली और न ही बामफ्रंट को ही। सीपीएम-कांग्रेस विधानसभा से बाहर हो गए और प्रधान विरोधी दल के रुप में BJP उभरकर सामने आयी। कांग्रेस नेतृत्व का मानना है कि शून्य से नीचे और गिर नहीं सकते। फिर आपने अस्तित्व की लड़ाई क्यों न अकेली लड़ी जाए। यहीं बात सीपीएम के मन में भी आ रही है कि कांग्रेस के साथ चुनावी गठबंधन करके राजनीतिक रुप में कोई अच्छा खासा असर सामने नहीं दिखा। इसलिए वर्ष 2026 के विधानसभा चुनाव में गठबंधन को लेकर न तो कांग्रेस आगे आयी और न ही सीपीएम। दोनों एक-दुसरे की प्रतिक्षा करती रही। अंत में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी ने यह स्पष्ठ कर दिया कि इसबार विधानसभा चुनाव कांग्रेस अकेली ही लड़ेगी। पश्चिम बंगाल के कुल 294 सीटों पर अपने उम्मीदवार देगी। बीते दिन गुरुवार को दिल्ली स्थित कांग्रेस के अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के आवास पर पश्चिम बंगाल नेतृत्व को लेकर एक अहम बैठक हुयी। इस अहम बैठक में अकेले लड़ने के निर्णय को सर्वसम्मती से पास किया गया। इस बैठक में कांग्रेस नेता राहुल गांधी, के.सी.बेणुगोपाल, पश्चिम बंगाल राज्य के कांग्रेस प्रभारी गुलाम अहमद मीर, प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष शुभंकर सरकार, पूर्व सांसद अधीर रंजन चैधरी, सांसद इशा खान समेत अन्य नेता उपस्थित थे। इस बैठक में कांग्रेस के कुछ वरिष्ठ नेताओं को वर्चुअली भी जोड़ा गया था। अधीर रंजन चैधरी ने कहा कि अकेले लड़ने का सिद्धांत अगर अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की है तो मैं इस निर्णय के साथ हूं। वहीं सीपीएम के राज्य सचिव मोहम्मद सलीम का कहना है कि उन्हें पहले ही अंदाजा लग चुका था कि कांग्रेस गठबंधन करने से पहले यह देख रही है कि उसे राजनीतिक रुप में ज्यादा लाभ किसने साथ जाने से मिलेगा। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि कांग्रेस-सीपीएम गठबंधन नहीं होने का कुछ प्रभाव तो सत्तारुढ़ तृणमूल कंाग्रेस के वोट बैंक पर भी पड़ेगी। क्योंकि 34 सालों से सीपीएम के शासनकाल में राजनीतिक रुप से प्रताड़ित हुए कांग्रेस कर्मी, समर्थक सीपीएम को वोट देने से कतरा रहे थे। वे अपना वोट तृणमूल कांग्रेस को या फिर बीजेपी को दे दिए थे। यहीं वजह है कि 2016 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस-सीपीएम गठबंधन प्रत्याशी में कांग्रेस प्रत्याशी को सीपीएम का वोट मिला, परन्तु सीपीएम प्रत्याशी को कांग्रेस समर्थकों का वोट नहीं मिला और 2021 के चुनाव में इसका हरजाना दोनो को ही भुगतना पड़ा। दोनो ही विधानसभा में शून्य हो गए। पश्चिम बंगाल प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष शुभंकर सरकार का कहना है कि सीपीएम के साथ कांग्रेस गठबंधन कर अपनी राजनीतिक सक्रियता खो रही थी। समर्थक एवं कर्मियों में जोश नहीं आ रहा था। संगठन पर भी इसका प्रभाव पड़ रहा है। इसलिए संगठन को मजबुत करने के लिए अकेले लड़ने का निर्णय लिया गया। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि कांग्रेस और सीपीएम का राज्य विधानसभा चुनाव में अकेले लड़ना तृणमूल कंाग्रेस के लिए भी एक चुनौती है। क्योंकि वोट के बंटवारे का हिस्सा किस ओर जाएगा, यह तो बैलट बाॅक्स खोलने पर ही पता चलेगा। हालांकि तृणमूल कांग्रेस नेतृत्व का कहना है कि जब मिलकर शुन्य पहुंच गए तो अकेले लड़कर और कहां पहुंचंेगे ? अब देखना यह है कि कांग्रेस सीपीएम से अलग होकर चुनाव लड़ने का निर्णय तो ले ली है, किन्तु क्या अल्पसंख्यक वोट को अपनी ओर खींचने के लिए TMC से निष्कासित विधायक हुमायूं कबीर की पार्टी जनता उन्नयन पार्टी (JUP) और ISF के विधायक नौशादी सिद्दीकी से गठबंधन कर रही है या नहीं ?

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