विधानसभा चुनाव से पहले TMC का बड़ा दावा, Voter List से 63 % हिंदू और 35 % मुस्लिमों के नाम हटे


कोलकाता :- पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण (एसआईआर) की प्रक्रिया पूरी होने के बाद राज्य की राजनीति में नया भूचाल आ गया है। इस प्रक्रिया के अंत में लगभग 91 लाख नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए हैं। हालांकि चुनाव आयोग ने इस संबंध में कोई आधिकारिक सांप्रदायिक डेटा जारी नहीं किया है, लेकिन तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) ने सूची जारी होने के मात्र 48 घंटों के भीतर अपने संगठनात्मक स्तर पर गणना कर एक चौंकाने वाला दावा पेश किया है। टीएमसी के अनुसार, हटाए गए कुल नामों में से लगभग 63 प्रतिशत नाम हिंदुओं के हैं, जिसे भाजपा के लिए एक बड़ी 'असहजता' के रूप में देखा जा रहा है।

तृणमूल कांग्रेस द्वारा प्रस्तुत इन आंकड़ों की 'सत्यता' पर भाजपा ने फिलहाल कोई सीधा सवाल नहीं उठाया है, लेकिन विपक्षी दल इस बात को लेकर हमलावर है कि टीएमसी के पास यह गुप्त डेटा पहुंचा कैसे। भाजपा नेता राजर्षि लाहिड़ी ने सवाल उठाते हुए कहा कि जब चुनाव आयोग ने ऐसी कोई जानकारी सार्वजनिक नहीं की, तो सत्ताधारी दल को यह आंकड़े किसने दिए। उन्होंने आशंका जताई कि क्या आंदोलनकारी बीएलओ ने तृणमूल को यह डेटा लीक किया है। दूसरी ओर, टीएमसी नेता अरूप चक्रवर्ती ने स्पष्ट किया कि कई एजेंसियों ने एसआईआर सूची को डिजिटाइज किया है और बूथ स्तर पर पार्टी के पास पहले से ही डेटा मौजूद था, जिसके लिए किसी जटिल शोध की आवश्यकता नहीं है।

टीएमसी के विस्तृत आंकड़ों के अनुसार, पहले चरण में हटाए गए 58 लाख नामों में से 44 लाख हिंदू थे, जबकि मुस्लिम नामों की संख्या लगभग 13.5 लाख थी। दूसरे चरण में हटाए गए 5.5 लाख नामों में से 5.28 लाख हिंदू नाम थे। हालांकि, तीसरे और अंतिम चरण में समीकरण बदले और हटाए गए 27 लाख नामों में से 17.5 लाख नाम मुस्लिम समुदाय के थे। यदि पूरी प्रक्रिया का औसत निकाला जाए, तो कुल हटाए गए नामों में 63 प्रतिशत हिंदू और 35 प्रतिशत मुस्लिम नाम हैं, जो लगभग 2:1 का अनुपात दर्शाता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि पहले चरण में बड़ी संख्या में हिंदू नामों का कटना मुख्य रूप से स्थानांतरण या एक से अधिक स्थानों पर नाम होने के कारण हो सकता है। लेकिन राजनीतिक गलियारों में इस बात की चर्चा तेज है कि मतुआ बहुल इलाकों में बड़े पैमाने पर हिंदुओं के नाम कटना आगामी चुनावों में भाजपा के लिए भारी पड़ सकता है, क्योंकि पिछले तीन बड़े चुनावों में इस क्षेत्र पर भाजपा का दबदबा रहा था। टीएमसी इस मुद्दे को भावनात्मक और राजनीतिक रूप से भुनाने की कोशिश में जुटी है, जिससे राज्य का चुनावी माहौल पूरी तरह गरमा गया है।

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