Kulti में घरों पर चला रेलवे का बुलडोजर, बेघर हुए कई परिवार, महिलाओं का फूटा गुस्सा

कुल्टी (राम बाबू यादव) :- ​"तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में, अफ़सोस! वक़्त लगता है एक घर बनाने में।" मशहूर शायर बशीर बद्र की ये पंक्तियां आज कुल्टी के बाल्टोडिया इलाके में पूरी तरह चरितार्थ होती दिखीं, जहां रेलवे की जमीन पर बने आशियानों को पल भर में मलबे के ढेर में तब्दील कर दिया गया। रेलवे प्रबंधन द्वारा दिए गए अल्टीमेटम के बाद आज आखिरकार उन गरीब परिवारों के घरों पर बुलडोजर चल ही गया, जो बरसों से यहां अपनी जिंदगी बुन रहे थे। इस प्रशासनिक कार्रवाई के बाद जो मंजर सामने आया, वह किसी का भी दिल दहला देने के लिए काफी था। बरसों की मेहनत से खड़ी की गई कच्ची-पक्की दीवारें जब भरभराकर गिरीं, तो उनके साथ कई परिवारों के सपने और उम्मीदें भी जमींदोज हो गईं। अपने ही बिखरे हुए आशियाने के मलबे पर बैठे बेघर लोग अपनी बेबसी और तकदीर पर आंसू बहाने के अलावा कुछ नहीं कर पा रहे हैं।


इस कार्रवाई के बाद बेघर हुए परिवारों का दर्द और लाचारी बयां करने लायक नहीं है। अपनी गृहस्थी के सामान को खुले आसमान के नीचे समेटे कुछ लोगों ने बेहद भावुक होकर बताया कि वे लंबे समय से इसी इलाके में रहते आ रहे हैं। वे जानते हैं कि यह जमीन रेलवे की है, लेकिन उनके पास इसके अलावा कोई चारा नहीं था। वे रोज कमाने-खाने वाले दिहाड़ी मजदूर हैं, जो दिनभर पसीना बहाकर बमुश्किल दो वक्त की रोटी का इंतजाम कर पाते हैं। उनके पास इतनी आर्थिक क्षमता ही नहीं है कि वे कहीं जमीन खरीद सकें, नया घर बना सकें या भारी-भरकम किराया देकर किसी मकान में रह सकें। कड़कड़ाती धूप और मौसम की मार के बीच अब उनके सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि वे आज की रात अपने मासूम बच्चों और बुजुर्गों को लेकर कहां सिर छिपाएंगे।


इस तबाही के बीच महिलाओं का गुस्सा और बेबसी कैमरे के सामने फूट पड़ी। रोते और बिलखते हुए उन्होंने राजनीतिक व्यवस्था पर गहरा आक्रोश व्यक्त किया। महिलाओं ने कहा कि जब भी चुनाव आते हैं, तो हर राजनीतिक दल के नेता हाथ जोड़कर उनके दरवाजे पर आ जाते हैं और बड़े-बड़े वादे करते हैं। लेकिन जैसे ही चुनाव बीत जाते हैं, कोई उनकी सुध लेने तक नहीं आता। आज जब उनके सिर से छत छीनी जा रही है और उनके बच्चे खुले आसमान के नीचे आने को मजबूर हैं, तो कोई भी नेता या हमदर्द उनके साथ खड़ा होने के लिए नहीं आया। आशियाना उजड़ जाने के बाद इन परिवारों के सामने अब पहचान, सुरक्षा और अस्तित्व का एक ऐसा गहरा संकट खड़ा हो गया है, जिसका फिलहाल उन्हें कोई समाधान नजर नहीं आ रहा है।

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