अंदरूनी कलह के बीच TMC की सभी कमेटियां भंग, बागी विधायकों ने ऋतब्रत बनर्जी को विपक्ष का नेता बनाने के लिए स्पीकर को सौंपी चिट्ठी

कोलकाता :- पश्चिम बंगाल के सियासी गलियारों से इस वक्त की सबसे बड़ी खबर सामने आ रही है। अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस (AITC) ने एक बड़ा और कड़ा फैसला लेते हुए पश्चिम बंगाल में पार्टी की सभी कमेटियों के साथ-साथ उसके सभी अग्रणी (फ्रंटल) संगठनों को तत्काल प्रभाव से भंग कर दिया है। पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के अनुसार, अब हर स्तर पर आत्ममंथन, प्रदर्शन की समीक्षा और संगठनात्मक मूल्यांकन की एक व्यापक प्रक्रिया शुरू की जाएगी। इस विस्तृत समीक्षा से जो निष्कर्ष निकलेंगे, उनके आधार पर मुख्य पार्टी और उसके सभी फ्रंटल संगठनों के ढांचे का नए सिरे से पुनर्गठन किया जाएगा और आने वाले समय में इसकी आधिकारिक घोषणा की होगी। पार्टी का कहना है कि यह कदम भविष्य की चुनौतियों से निपटने और संगठन को नई ऊर्जा देने के लिए उठाया गया है। गौरतलब है कि पूर्व मुख्यमंत्री और तृणमूल सुप्रीमो ममता बनर्जी पहले ही यह साफ कर चुकी थीं कि वह पार्टी को नए सिरे से सजाएंगी और जिन्हें पार्टी छोड़कर जाना है, वे जा सकते हैं।

इस सांगठनिक फेरबदल के बीच तृणमूल कांग्रेस के भीतर मची भीषण बगावत भी अब खुलकर सामने आ गई है। तृणमूल के बागी विधायकों ने विधानसभा स्पीकर रथींद्र बसु को एक पत्र सौंपकर ऋतब्रत बनर्जी को विधानसभा में विपक्ष का नेता बनाने की मांग की है। इस पत्र पर ऋतब्रत बनर्जी के अलावा पार्टी के 58 विधायकों के हस्ताक्षर हैं। बागी विधायकों ने इस चिट्ठी में न केवल विपक्ष के नेता का नाम प्रस्तावित किया है, बल्कि पश्चिम बंगाल विधानसभा में तृणमूल के उप-नेताओं के नामों का भी उल्लेख किया है। इस पद के लिए संदीपन साहा, जावेद खान, सबीना यास्मिन और शिउली साहा के नामों का प्रस्ताव रखा गया है, जबकि मुख्य सचेतक (चीफ व्हिप) के रूप में अखरुज्जमान के नाम की सिफारिश की गई है। विधानसभा अध्यक्ष ने इस पत्र को स्वीकार कर लिया है। विशेष बात यह है कि बागी विधायकों द्वारा सौंपे गए इस पत्र में अब भी ममता बनर्जी को ही पार्टी का अध्यक्ष (सभानेत्री) बताया गया है।

दरअसल, तृणमूल के भीतर दरार उस वक्त और चौड़ी हो गई जब हाल ही में एक 'हस्ताक्षर विवाद' खुलकर सामने आया। विवाद की शुरुआत विधानसभा में विपक्ष के नेता के तौर पर वरिष्ठ तृणमूल विधायक शोभनदेव चट्टोपाध्याय को मान्यता देने के प्रस्ताव वाले पत्र से हुई थी। आरोप लगा कि तृणमूल के अखिल भारतीय महासचिव अभिषेक बनर्जी ने स्पीकर रथींद्र बसु को जो प्रस्ताव भेजा था, उसमें कई तृणमूल विधायकों के फर्जी दस्तखत किए गए थे। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने इस मामले में जानकारी देते हुए बताया कि ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा ने ही सबसे पहले इस फर्जी हस्ताक्षर के मामले से विधानसभा को अवगत कराया था। इसके बाद हेयर स्ट्रीट थाने में एक प्राथमिकी (FIR) दर्ज की गई, जिसकी जांच में अब पुलिस के साथ सीआईडी (CID) भी सहयोग कर रही है। सीआईडी की टीम इस मामले की तफ्तीश के तहत अब तक 13 विधायकों से पूछताछ कर चुकी है।

इस फर्जी हस्ताक्षर कांड को लेकर मचे घमासान के बीच राजनीतिक हलकों में यह कयासबाजी तेज हो गई है कि क्या तृणमूल कांग्रेस पूरी तरह से बिखरने की कगार पर पहुंच गई है? विपक्ष का नेता किसे बनाया जाए, इस बात को लेकर पार्टी के भीतर लंबे समय से खींचतान चल रही थी। विवाद बढ़ने पर तृणमूल नेतृत्व ने ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा को पहले ही पार्टी से निष्कासित कर दिया था, लेकिन इस कार्रवाई के बाद पार्टी के अंदरूनी हालात सुधरने के बजाय और बिगड़ गए। निष्कासन के बाद से ही तृणमूल के भीतर की टूट और गहरी हो गई और एक-एक कर कई विधायकों ने पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के खिलाफ खुलकर मोर्चा खोल दिया। इसी का नतीजा है कि पार्टी में बागी विधायकों की संख्या लगातार बढ़ती चली गई, जिसने अब तृणमूल कांग्रेस के सामने एक अभूतपूर्व संकट खड़ा कर दिया है।

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